बुधवार, 19 नवंबर 2008

आया है ये कैसा पतझड़

आया है ये कैसा पतझड़
चारों ओर है वीरानगी
पाशविकता और बेचारगी
मचा हुआ है हाहाकार
नारकीयता और यह नरसंहार
आया है ये कैसा पतझड़
सामाजिक सौहार्दता कही खो गई
मानवता कहा सो गई ?
संस्कार हो गए सारे गुम
आदर्शता पड़ने लगी कम
आया है ये कैसा पतझड़
दिखावे का खेल अनूठा
आवरण आधुनिक और झूठा
संस्कृति होने लगी मृतपाय
पैसा बन गया सभी का अभिप्राय
आया है ये कैसा पतझड़
यदि सौहार्द रूपी बसंत का हो आगमन
सुखी हो जाए सबके मन
हट जाए वीराने बादल
हरियाला हो जाए आँचल

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।


भूख से लड़ती,धूप में तपती
कर्मठ सुकोमल नारी को देखा है।
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।
गला सूखा, जीभ प्यासी
फिर भी अपने जिगर के टुकड़े को
वक्ष से लगाकर पयपान कराते देखा है।
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।
मैली कुचैली तार-तार
फटी साडी में सहम कर
तनमन छुपाते देखा है,
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।
खुद भूखे पेट रहकर भी
पेट की ज्वाला भड़कने पर भी
घरवालों को भरपेट खिलाते देखा है।
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।
फूस की झोंपडी में
तेज आँधी-पानी में
खुद भीगते हुए भी
अपने बच्चे को बचाते देखा हैं।
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।
हर नई सुबह
सुनहरे भविष्य के सूर्य के उगने के इंतजार में
आशान्वित होते देखा है
आँसू को मुस्कान में ढलते देखा है।

रविवार, 9 नवंबर 2008

सुविचार संग्रह

1.निराशा के अंधेरे को दूरकर
आशा का दीप जलाओ।
आपस में स्‍नेह जगा कर
मानवता को अपना धर्म बनाओ
2.प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में अनेक विशेषताएं छुपी होती है,जिन्‍हें जागृत करके ही व्‍यक्‍ति का जीवन सफल और सार्थक बन सकता है .
3.सत्‍य और अहिंसा के द्वारा जीवन की हर लड़ाई जीती जा सकती है।
-महात्‍मा गांधी
4.हिंदी देश की एकता की ऐसी कड़ी है,जिसे मजबूत करना प्रत्‍येक भारतीय का प्रथम कर्तव्‍य है-श्रीमती इंदिरा गांधी
5.हिंदी राजभाषा है अपनी
दें हम इसे प्रतिष्‍ठा
इसके प्रति हम रखे निरंतर
अपनी सच्‍ची निष्‍ठा
6.मदद करने के लिए उठे हाथ दुआ करने वाले हाथों से श्रेष्‍ठ होते है।
7.विचार करके बोलना श्रेष्‍ठता और बोलने के बाद विचार करना मूर्खता है।
8.अपने दोषों तथा कमियों को जान लेना उन पर विजय प्राप्‍त करने का पहला कदम है।
9.तिरंगा हमारा भारतवर्ष की शान है। विश्‍व भर में हमारी संस्‍कृति की पहचान है।
10.व्‍यक्‍ति काम की अधिकता से नहीं, काम की अव्‍यवस्‍था से थकता है।
11. बिना चरित्र के शिक्षा का कोई महत्‍व नहीं है। (सरदार वल्‍लभ भाई पटेल)
12.इंसान के व्‍यवहार की छोटी-छोटी बातें ही उसके चरित्र का आईना होती है।
13।प्रसिद्वि और धन उस समुद्री जल के समान है,जिसे पीने पर प्‍यास और बढ़ती जाती है।

14हम जितना अधिक अध्‍ययन करेंगे ,उतना ही हमें अपनी अज्ञानता का आभास होगा ।
15.क्रोध और जल्‍दबाजी से व्‍यक्‍ति का कोई काम नहीं बनता,बल्‍कि और बिगड़ जाता है।
16.कभी कभी छोटी सी एक असफलता कई बड़ी सफलताओं के द्वार खोल देती है।
17.दूसरों के साथ वह व्‍यवहार न करें जो हमें अपने लिए पसंद नहीं हो।
18.जीवन एक पाठशाला है जिसमें व्‍यक्‍ति अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करता है।
19.प्रत्‍येक अच्‍छा कार्य पहले असंभव लगता है।
20.असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ।

बुधवार, 5 नवंबर 2008

चाहतें



इस भागदौड भरी जिंदगी में पाना चाहती हु सुकून के कुछ पल
दिशाहीन उड़ानें भरते
मन के पंछी की रोकना चाहती हूं हलचल
किसी पेड़ के साए तले
तुम्हारे कंधे पर सर रखकर ढढना
चाहती हूं समस्याओं के हल
तुम्हारे साथ मिलकर
दिल के तारों को छेड़कर
गुनगुनाना चाहती हूं एक मीठी गजल
टिमटिमाते तारों को हाथ से छूकर
बनाना चाहती हूं उन्हें अपना आँचल
दूर किसी जंगल में विचरते हुए
प्रकृति माँ की गोद में बिताना चाहती हूं पल-पल।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आज कल में डूब गया



क्या हुआ कि-
कुछ यादें ताजा हुई
नजरें कुछ ढूंढने लगी
दिल कुछ कहने लगा
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?
क्या हुआ कि -
आंखें कुछ नम हो गई
मन कहीं खोने लगा
स्मृति कोष हुए हरे-भरें
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?
क्या हुआ कि -
होंठों पर गीत पुराना आ गया।
मंजरियों की अलकें झूलने लगीं
मन पुरानी गलियों में घूमने लगा
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?