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सोमवार, 14 सितंबर 2009
हिन्दी दिवस
हिन्दी दिवस की सभी भारतीयों को बहुत बहुत बधाई .....आइये हम सब मिल कर यह प्रणकरे की अपनी इस भाषा को वह सम्मान दिलाएंगे , जिसकी वह हकदार है । हमारी हिन्दी भाषा को महज़ खोकले और दिखावटी नारों की नही ,सच्चे भावों और दृढ निश्चयी कर्मठ सेवको की आवश्यकता है ... जय हिंद , जय हिन्दी !!!

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गुरुवार, 13 अगस्त 2009
हमारा भाषा ज्ञान
बात तब की है जब मेरे विवाह को मात्र ६ महीने ही हुए थे , और मुझे बी.एड में प्रवेश मिल गया ( वैसे हमें उम्मीद तो थी नही इसीलिए फॉर्म भर दिया गया था ) लेकिन जब प्रवेश मिल गया तो फिर पढ़ना ही था , लेकिन एक दिक्कत थी प्रवेश मिला था चंद्रपुर में , जो नागपुर से ३ घंटे की दूरी पर है , सब लोगो ने कहा की कॉलेज ज्वाइन कर लो , रोज आना जाना कर लेना । लेकिन यह सम्भव नही था क्योकि कॉलेज का समय सुबह ९-०० से शाम ४-०० बजे तक था , अतः यह तय किया गया की सप्ताह में एक दिन या तो मैं नागपुर आ जाया करुँगी या तो पतिदेव ही वह आ जाया करेंगे । हमें ख़ुद पर ही गुस्सा आ रहा था की क्या जरूरत थी , अपने आगे पढने के शौक को ससुराल वालों के आगे व्यक्त करने की। मरते क्या ना करते , भारी मन से चंद्रपुर जाने की तयारी की , जितना ६ महीने पहले शादी के बाद विदा होते हुए ना रोये थे , उससे कई गुना ज्यादा आंसू हमारे बहे । खेर जी ,आ गए हम चंद्रपुर । एक तो मैं वैसे ही महाराष्ट्र में नई थी और मराठी भाषा से एकदम अनजान ऊपर से चंद्रपुर में एकदम शुद्ध मराठी ही बोली जाती थी , कॉलेज में भी सभी एक दूसरे से मराठी में ही बात किया करते थे , और बहुत जल्दी मित्रता करने और लोगो से मिक्स अपहोने वाली मैं चुपचाप वहा लोगो का मुह देखा करती थी ।
मेरे ही कॉलेज की एक लड़की जो की नागपुर की ही थी , हम दोनों ने मिल कर एक फ्लैट किराये पर ले लिया था , जब तक हम दोनों ही रह रहे थे तब तक तो ठीक ही था , मगर एक दिन उस लड़की ने बताया की उसकी एक दूर के रिश्ते कीमौसी भी हमारे साथ रहने की इच्छुक है , हमें क्या आपत्ति हो सकती थी , हम खुश हो गए की चलो अब मौसी के हाथ का खाना भी खाने को मिलेगा ( मेरी रूम मेट जो की मेरी ही उम्र की थी उसे कुछ काम करना नही आता था , और वह मुझसे उमीद करती थी की चुकी मैं शादीशुदा हु , तो खाना इत्यादी मैं ही बनाऊ ) एक तो नई नवेली दुल्हन होने के कारन ससुराल में हमसे कुछ खास काम करवाया नहीं गया था और हमें खाना इत्यादी बनाने के कोई खास अनुभव भी नहीं था , लेकिन चुकी टिफिन के खाने से तबियत ख़राब हो रही थी , इसलिए तय किया गया की खाना हम ही लोग मिल कर पकाएंगे । पर हाय रे किस्मत , मौसी के हाथ का खाना हमें बहुत कम ही नसीब हुआ , मौसी को घूमने से फुर्सत नहीं थी , साथ वाली लड़की के पास यह बहाना था शायद सच्चाई भी , की उसे कुछ खाना बनाना नहीं आता ,गनीमत थी की वह सब्जी काटने में और प्लेट लगाने में मदद कर दिया करती थी
एक तो मैं बड़ी मेहनत से खाना तैयार करू , दोनों खाते खाते मस्त बतियाते भी जाए और ऊपर से नुस्ख भी निकालती जाए , मुझे ऐसा लगता था की मैं रिश्ते में इनकी बहु लगती हु , श्रीमान जी को बताया तो उन्होंने कहा की तुम सिर्फ अपने लिए खाना बना कर सबसे पहले खा लिया करो , पर हाय रे शिष्टाचार , ऐसा कैसे किया जा सकता था ?
मौसी तो पुरी मौसी थी , उनका कॉलेज हमसे पहले छूट जाया करता था लेकिन वे तब ही घर में आती जब हम चाय बना चुकते , और चाय पी कर वे जो जाती तो तभी घर आती ,जब हम दोनों खाना बना चुके होते । जाते वक्त वे बोल कर जाती की - मीअली कड़े जाते । अब कुछ दिनों बाद हमें मराठी भाषा के कुछ शब्द समझ आने लगे थे और कुछ शब्द हम अंदाज से समझ जाया करते थे । २-३ बार लोगो के मुह से सुना था --तुझा कड़े किल्ली आहे का? जिसका मतलब था की तेरे पास चावी है क्या । इस प्रकार हमने कड़े शब्द का मतलब लगाया -पास , जो की उस वाक्य के हिसाब सही भी था , जब मौसी रोज शाम को बोल कर जाती थी - मी अली कड़े जाते ,तो मैं मतलब लगाया करती थी की - मैं अली के घर जा रही हु । जब सप्ताह के अंत में मैं नागपुर आती तो श्रीमान जी को बताया करती की मौसी तो रोज अली नाम के किसी व्यक्ति के घर जाया करती है और हम लोग बहुत हँसा करते , बहुत दिनों बाद जब अली कड़े शब्द का अर्थ पता चला तो और भी हसी आई , अली कड़े का मतलब है इधर उधर से , और हमने जाने क्या समझ लिया था
मेरे ही कॉलेज की एक लड़की जो की नागपुर की ही थी , हम दोनों ने मिल कर एक फ्लैट किराये पर ले लिया था , जब तक हम दोनों ही रह रहे थे तब तक तो ठीक ही था , मगर एक दिन उस लड़की ने बताया की उसकी एक दूर के रिश्ते कीमौसी भी हमारे साथ रहने की इच्छुक है , हमें क्या आपत्ति हो सकती थी , हम खुश हो गए की चलो अब मौसी के हाथ का खाना भी खाने को मिलेगा ( मेरी रूम मेट जो की मेरी ही उम्र की थी उसे कुछ काम करना नही आता था , और वह मुझसे उमीद करती थी की चुकी मैं शादीशुदा हु , तो खाना इत्यादी मैं ही बनाऊ ) एक तो नई नवेली दुल्हन होने के कारन ससुराल में हमसे कुछ खास काम करवाया नहीं गया था और हमें खाना इत्यादी बनाने के कोई खास अनुभव भी नहीं था , लेकिन चुकी टिफिन के खाने से तबियत ख़राब हो रही थी , इसलिए तय किया गया की खाना हम ही लोग मिल कर पकाएंगे । पर हाय रे किस्मत , मौसी के हाथ का खाना हमें बहुत कम ही नसीब हुआ , मौसी को घूमने से फुर्सत नहीं थी , साथ वाली लड़की के पास यह बहाना था शायद सच्चाई भी , की उसे कुछ खाना बनाना नहीं आता ,गनीमत थी की वह सब्जी काटने में और प्लेट लगाने में मदद कर दिया करती थी
एक तो मैं बड़ी मेहनत से खाना तैयार करू , दोनों खाते खाते मस्त बतियाते भी जाए और ऊपर से नुस्ख भी निकालती जाए , मुझे ऐसा लगता था की मैं रिश्ते में इनकी बहु लगती हु , श्रीमान जी को बताया तो उन्होंने कहा की तुम सिर्फ अपने लिए खाना बना कर सबसे पहले खा लिया करो , पर हाय रे शिष्टाचार , ऐसा कैसे किया जा सकता था ?
मौसी तो पुरी मौसी थी , उनका कॉलेज हमसे पहले छूट जाया करता था लेकिन वे तब ही घर में आती जब हम चाय बना चुकते , और चाय पी कर वे जो जाती तो तभी घर आती ,जब हम दोनों खाना बना चुके होते । जाते वक्त वे बोल कर जाती की - मीअली कड़े जाते । अब कुछ दिनों बाद हमें मराठी भाषा के कुछ शब्द समझ आने लगे थे और कुछ शब्द हम अंदाज से समझ जाया करते थे । २-३ बार लोगो के मुह से सुना था --तुझा कड़े किल्ली आहे का? जिसका मतलब था की तेरे पास चावी है क्या । इस प्रकार हमने कड़े शब्द का मतलब लगाया -पास , जो की उस वाक्य के हिसाब सही भी था , जब मौसी रोज शाम को बोल कर जाती थी - मी अली कड़े जाते ,तो मैं मतलब लगाया करती थी की - मैं अली के घर जा रही हु । जब सप्ताह के अंत में मैं नागपुर आती तो श्रीमान जी को बताया करती की मौसी तो रोज अली नाम के किसी व्यक्ति के घर जाया करती है और हम लोग बहुत हँसा करते , बहुत दिनों बाद जब अली कड़े शब्द का अर्थ पता चला तो और भी हसी आई , अली कड़े का मतलब है इधर उधर से , और हमने जाने क्या समझ लिया था
शुक्रवार, 13 मार्च 2009
निकट भविष्य में वह समय आएगा

निकट भविष्य में वह समय आएगा ,
जब इन्सान रिमोट से संचालित होने वाला यन्त्र बन जायेगा
पति का रिमोट पत्नी के हाथ और बहु का रिमोट सास के पास होगा ,
सब एक दूसरे पर नियंत्रण रखने की करेंगे कोशिश, पर कोई भी सही ढंग से नियंत्रित ना होने पायेगा ।
निकट भविष्य में वह समय आएगा ,
जब पेट्रोल डीजल के सारे भंडार ख़तम हो जायेंगे,
और पेर्तोल-डीजल पम्पों की जगह शुद्ध वायु , शुद्ध पानी पम्प खुल जायेंगे ,
लोग लम्बी लम्बी कतारों में लग कर हजारों लाखों रूपये में कुछ घूंट पानी और कुछ मिनिट तक शुद्ध वायु का सेवन करेंगे ,
आने जाने के लिए इन्सान या तो साईकिल का इस्तेमाल करेगा या फिर उड़ना सीखेगा ,
और वर्तमान की कारों , गाड़ियों का इस्तेमाल घरों के रूप में किया जायेगा ।
निकट भविष्य में वह समय आएगा ,
जब दिन भर का भोजन एक टेबलेट में समा जायेगा ,
दवा की दूकानों में उन गोलियों के लिए लगी होगी लम्बी लम्बी कतारें ,
पर उसके लिए भी पहचान पत्र और राशन कार्ड बनवाया जाएगा ,
प्रति सदस्य १ टेबलेट के हिसाब से १५-१५ दिन की टेबलेट ही दी जायेगी ,
सब अपनी अपनी टेबलेट अपने पर्स या अपनी जेब में लेकर चलेंगे ,
और शादी ब्याह जन्मदिन इत्यादि मोको पर खाने पीने का कोई आयोजन ही नही रह जाएगा
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
तब और अब

मित्रो , यह कविता नहीं बल्कि मेरे विवाहपूर्व के अल्हड जीवन और वर्तमान के व्यस्त और जिम्मेदारियों से युक्त जीवन की पूरी इमानदारी के साथ की गई तुलना है , इसलिए ही मैंने इसका शीर्षक चुना है -तब और अब
(!!! सभी पाठको को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !!!)
तब निरंतर जारी रहता ,हसने का क्रम
अब एक मुस्कराहट भी आ जाए , तो बड़ी बात है ।
तब हजारो रेसिपिया संजोते थे डॉयरियो में हम
अब एक व्यंजन भी बन जाए , तो बड़ी बात है ।
तब हजारो गीत गुनगुनाते थे हम
अब एक पंक्ति भी गा पाये ,तो बड़ी बात है ।
तब नित तारीफों की बरसात में भीगते थे हम
अब सराहना की एक बूँद भी पा जाए ,तो बड़ी बात है ।
तब दूसरो के बच्चों को सुनाया करते थे हजारो रोचक कहानिया हम ,
अब ख़ुद के बच्चों को एक कहानी भी सुना पाये , तो बड़ी बात है ।
तब एक जरा सी बात पर नदियाँ आसुओं की बहाया करते थे हम ,
अब हज़ार ग़मों में एक आंसू भी आ जाए , तो बड़ी बात है ।
तब एकदम निश्चिंत ,एकदम बेफिक्र थे हम ,
अब एक चिंता भी कम हो जाए ,तो बड़ी बात है ....
गुरुवार, 11 दिसंबर 2008
चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार के लिए क्या योग्यताए होना चाहिए ?

आतंकवाद की इस घटना ने हम सभी भारतीयों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है की हमारे राजनीतिको में देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने की योग्यता नहीं है , यह भी कहा जा रहा है की हम सब का यह नैतिक जिम्मेदारी है की मतदान करे और चुनाव में योग्य उम्मीदवार को ही जिताए । पर ऐसे में यह सवाल भी उठता है की सभी उम्मीदवार एक जैसे ही लगते है और कौन योग्य निकलेगा ,कौन नही वह तो सत्ता में आने के बाद ही पता चलेगा । मुझे लगता है की यह मेरी ही नही हर आम मतदाता की , हर भारतीय की उलझन है । मुंबई की घटना के पश्चात् से ही यह उलझन मेरे मन को बहुत मथरही थी , बहुत सोचने के उपरांत कुछ उपाय सूझे , जिन्हें मैं आप के साथ बाटना चाहूंगी ...
१- चुनाव में खड़े होने के लिए उम्मीदवार का कम से कम स्नातक होना अनिवार्य करना चाहिए।
२- जिस तरह किसी छोटी से छोटी नौकरी के लिए भी अनिवार्य योग्यता और अनुभव आवश्यक होता है , उसी तरह जिन लोगो को देश की इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालनी है ,उनके लिए यह अनिवार्य होना चाहिए की उन्हें समाजसेवा का कम से कम ५-६ वर्षो का अनुभव हो .
३-कोई आपराधिक मामला या आपराधिक प्रष्ठभूमि नही होना चाहिए ,बल्कि कुछ अच्छी उपलब्धिया उनके नाम होना चाहिए । छवि साफ सुथरी होना चाहिए।
४- नौकरी की तरह उनके लिए भी प्रोबेशन पीरियड का प्रावधान होना चाहिए ।
५- ऐसे उम्मीदवार जो भड़काऊ भाषण देते है और जात ,धर्म और भाषा के नाम पर देश को बाटने का कार्य करते है ,चुनाव आयोग को उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा देनी चाहिए ।
६-हर ६ माह में उनके द्वारा किए गए काम की समीक्षा केन्द्र स्तर पर गठित ऐसे निष्पक्ष आयोग से की जनि चाहिए ,जिसका कोई पार्टी से सम्बन्ध न हो ।
७- हर उम्मीदवार को शिक्षित होने के साथ साथ कंप्यूटर तथा आधुनिक तकनिकी ज्ञान में भी दक्ष होना चाहिए ।
८-उम्मीदवारों के पार्टी बदलने पर रोक लगनी चाहिए।
फिलहाल इतना ही , आप सब से इस विषय पर सुझाव सदर आमंत्रित है ....
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