बुधवार, 5 नवंबर 2008

चाहतें



इस भागदौड भरी जिंदगी में पाना चाहती हु सुकून के कुछ पल
दिशाहीन उड़ानें भरते
मन के पंछी की रोकना चाहती हूं हलचल
किसी पेड़ के साए तले
तुम्हारे कंधे पर सर रखकर ढढना
चाहती हूं समस्याओं के हल
तुम्हारे साथ मिलकर
दिल के तारों को छेड़कर
गुनगुनाना चाहती हूं एक मीठी गजल
टिमटिमाते तारों को हाथ से छूकर
बनाना चाहती हूं उन्हें अपना आँचल
दूर किसी जंगल में विचरते हुए
प्रकृति माँ की गोद में बिताना चाहती हूं पल-पल।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आज कल में डूब गया



क्या हुआ कि-
कुछ यादें ताजा हुई
नजरें कुछ ढूंढने लगी
दिल कुछ कहने लगा
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?
क्या हुआ कि -
आंखें कुछ नम हो गई
मन कहीं खोने लगा
स्मृति कोष हुए हरे-भरें
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?
क्या हुआ कि -
होंठों पर गीत पुराना आ गया।
मंजरियों की अलकें झूलने लगीं
मन पुरानी गलियों में घूमने लगा
और आज कल में डूब गया।
कौन याद आ गया ?

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

मिलती है मंजिल उसे



















मिलतीहै मंजिल उसे,
जो कंटकों पर चल सकें,
करे कुछ ऐसा कि
ये दुनिया बदल सकें।
मिलती है मंजिल उसे
जो संघर्ष की धूप सह सकें
पार कर सकें गमों की डगर बिन सहारें
कठिनाईयों को पी सकें।
मिलती है मंजिल उसे
जो न हो असफलताओं से पराजित
लोगों की बातों से न हो विचलित
कुंदन सा तप सकें।







कवि तुम लिखो ऐसा गीत


कवि तुम लिखो ऐसा गीत
कवि तुम लिखो ऐसा गीत
विश्व में फैले भारत की कीर्ति
उकेर दो कुछ शब्द
देश की यश कीर्ति पर
पावन गंगा जमना पर
गांधी नेहरू सुभाष पर
अपने प्राणों से प्यारे वतन पर
अपनी गौरवमयी संस्कृति पर
देश के अमर शहीदों पर।
कवि तुम लिखो ऐसा गीत
जिससे बढे भाईचारा और प्रीत
मिट जाए द्वेष,क्षेत्रीयता और नफरत की भावना
हो सिर्फ राष्ट्रीयता, देशप्रेम और अखंडता की कामना
हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई
मिलकर बजाए एकता की शहनाई।
कवि तुम लिखो ऐसा गीत
भूल न पाएं हम अपना गौरवशाली अतीत
युवाओं में फैले जागृति
होकर प्रेरित,करें वे उन्नति
उत्साह का उनमें संचार हो
जिम्मेदारियों का उन्हें एहसास हो
छंट जाए निराशा और अवसाद के बादल
खुशहाली छा जाए पल पल
कवि तुम लिखो ऐसा गीत
कवि तुम लिखो ऐसा गीत
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रविवार, 17 अगस्त 2008

कब तक उपेक्षित रहेगी हमारी राजभाषा-राष्ट्रभाषा हिन्दी ?

1४ sitambar आने वाला है और सभी केंद्रीय संस्थानों में शुरू होने वाली है हिन्दी पखवाडा,हिन्दी सप्ताह या हिन्दी दिवस को मनाने की कवायद । इन दिनों सभी कार्यालयों में हिन्दी से जुड़े हुए विद्वानों की खोज होगी ,हिन्दी के समारोह आयोजित किए जायेंगे ,हिन्दी को प्रोत्साहित करने की बात होगी और फिर हलचल समाप्त और अगले साल तक के लिए शान्ति व्याप्त ।
सवाल यह उठता है कि क्या हिन्दी को वाकई इन पखवाड़ों-सप्ताहों की जरूरत है ? देखा जाए तो हिन्दी को वास्तव में इन पखवाड़ों-सप्ताहों दिवसों की जरूरत नही है, हमारी राजभाषा -राष्ट्रभाषा हिन्दी को जरूरत है तो शताब्दी की ,हम भारतीयों के संकल्प की ,और इस मामले में सरकार के दृढ होने की । ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है ,बस सरकार को हिन्दी को रोजगार और शिक्षा के सभी स्तरपर अनिवार्य रूप से जोड़ने की आवश्यकता है । भारत में जब अंग्रेजी लागू हुई तो क्या अंग्रेजो ने अंग्रेजी दिवस मनाये या अंग्रेजी में काम करने का निवेदन किया ? जबाब एकदम साफ़ है कि उन्होंने ऐसा कुछ ना करते हुए अंग्रजी को सीधे रोजगार से जोड़ दिया , अब जिनको नौकरी चाहिए उन्होंने एबी सी डी से शुरुआत करते हुए विदेशी भाषा भी सीखी और उसमे काम करने की आदत भी डाली । इस मामले में महाराष्ट्र सरकार के कदम तारीफ के लायक है । उन्होंने नौकरी के हर स्तर पर मराठी को उचित तरीके से लागू किया है ,चाहे कितना भी बड़ा तकनिकी या अभियांत्रिकी संसथान हो, वहा से आने वाले पत्र अनिवार्य रूप से मराठी में ही आते है , ऐसा केंद्रीय स्तर पर भी तो हिन्दी को अनिवार्य roop सेअपना कर kiya जा सकता है .