गुरुवार, 13 अगस्त 2009

हमारा भाषा ज्ञान

बात तब की है जब मेरे विवाह को मात्र ६ महीने ही हुए थे , और मुझे बी.एड में प्रवेश मिल गया ( वैसे हमें उम्मीद तो थी नही इसीलिए फॉर्म भर दिया गया था ) लेकिन जब प्रवेश मिल गया तो फिर पढ़ना ही था , लेकिन एक दिक्कत थी प्रवेश मिला था चंद्रपुर में , जो नागपुर से ३ घंटे की दूरी पर है , सब लोगो ने कहा की कॉलेज ज्वाइन कर लो , रोज आना जाना कर लेना । लेकिन यह सम्भव नही था क्योकि कॉलेज का समय सुबह ९-०० से शाम ४-०० बजे तक था , अतः यह तय किया गया की सप्ताह में एक दिन या तो मैं नागपुर आ जाया करुँगी या तो पतिदेव ही वह आ जाया करेंगे । हमें ख़ुद पर ही गुस्सा आ रहा था की क्या जरूरत थी , अपने आगे पढने के शौक को ससुराल वालों के आगे व्यक्त करने की। मरते क्या ना करते , भारी मन से चंद्रपुर जाने की तयारी की , जितना ६ महीने पहले शादी के बाद विदा होते हुए ना रोये थे , उससे कई गुना ज्यादा आंसू हमारे बहे । खेर जी ,आ गए हम चंद्रपुर । एक तो मैं वैसे ही महाराष्ट्र में नई थी और मराठी भाषा से एकदम अनजान ऊपर से चंद्रपुर में एकदम शुद्ध मराठी ही बोली जाती थी , कॉलेज में भी सभी एक दूसरे से मराठी में ही बात किया करते थे , और बहुत जल्दी मित्रता करने और लोगो से मिक्स अपहोने वाली मैं चुपचाप वहा लोगो का मुह देखा करती थी ।
मेरे ही कॉलेज की एक लड़की जो की नागपुर की ही थी , हम दोनों ने मिल कर एक फ्लैट किराये पर ले लिया था , जब तक हम दोनों ही रह रहे थे तब तक तो ठीक ही था , मगर एक दिन उस लड़की ने बताया की उसकी एक दूर के रिश्ते कीमौसी भी हमारे साथ रहने की इच्छुक है , हमें क्या आपत्ति हो सकती थी , हम खुश हो गए की चलो अब मौसी के हाथ का खाना भी खाने को मिलेगा ( मेरी रूम मेट जो की मेरी ही उम्र की थी उसे कुछ काम करना नही आता था , और वह मुझसे उमीद करती थी की चुकी मैं शादीशुदा हु , तो खाना इत्यादी मैं ही बनाऊ ) एक तो नई नवेली दुल्हन होने के कारन ससुराल में हमसे कुछ खास काम करवाया नहीं गया था और हमें खाना इत्यादी बनाने के कोई खास अनुभव भी नहीं था , लेकिन चुकी टिफिन के खाने से तबियत ख़राब हो रही थी , इसलिए तय किया गया की खाना हम ही लोग मिल कर पकाएंगे । पर हाय रे किस्मत , मौसी के हाथ का खाना हमें बहुत कम ही नसीब हुआ , मौसी को घूमने से फुर्सत नहीं थी , साथ वाली लड़की के पास यह बहाना था शायद सच्चाई भी , की उसे कुछ खाना बनाना नहीं आता ,गनीमत थी की वह सब्जी काटने में और प्लेट लगाने में मदद कर दिया करती थी
एक तो मैं बड़ी मेहनत से खाना तैयार करू , दोनों खाते खाते मस्त बतियाते भी जाए और ऊपर से नुस्ख भी निकालती जाए , मुझे ऐसा लगता था की मैं रिश्ते में इनकी बहु लगती हु , श्रीमान जी को बताया तो उन्होंने कहा की तुम सिर्फ अपने लिए खाना बना कर सबसे पहले खा लिया करो , पर हाय रे शिष्टाचार , ऐसा कैसे किया जा सकता था ?
मौसी तो पुरी मौसी थी , उनका कॉलेज हमसे पहले छूट जाया करता था लेकिन वे तब ही घर में आती जब हम चाय बना चुकते , और चाय पी कर वे जो जाती तो तभी घर आती ,जब हम दोनों खाना बना चुके होते । जाते वक्त वे बोल कर जाती की - मीअली कड़े जाते । अब कुछ दिनों बाद हमें मराठी भाषा के कुछ शब्द समझ आने लगे थे और कुछ शब्द हम अंदाज से समझ जाया करते थे । २-३ बार लोगो के मुह से सुना था --तुझा कड़े किल्ली आहे का? जिसका मतलब था की तेरे पास चावी है क्या । इस प्रकार हमने कड़े शब्द का मतलब लगाया -पास , जो की उस वाक्य के हिसाब सही भी था , जब मौसी रोज शाम को बोल कर जाती थी - मी अली कड़े जाते ,तो मैं मतलब लगाया करती थी की - मैं अली के घर जा रही हु । जब सप्ताह के अंत में मैं नागपुर आती तो श्रीमान जी को बताया करती की मौसी तो रोज अली नाम के किसी व्यक्ति के घर जाया करती है और हम लोग बहुत हँसा करते , बहुत दिनों बाद जब अली कड़े शब्द का अर्थ पता चला तो और भी हसी आई , अली कड़े का मतलब है इधर उधर से , और हमने जाने क्या समझ लिया था

5 टिप्‍पणियां:

अर्शिया अली ने कहा…

Achchha laga jaankar.
( Treasurer-S. T. )

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

अच्छा लेख

सतीश पंचम ने कहा…

रोचक पोस्ट। माउशी ला सांगा, काय दर दिवस अली कडे जाते, एखादा वेळी पली कडे पण जाउन ये ना :)

( मौसी से कहिये कया हर रोज अली ( इधर ही) जाकर आती हो ....कभी पली कडे ( उधर) भी जाकर आईये न ।

*अलीकडे - इधर की तरफ
*पलीकडे - उधर की तरफ

यहां एक बात औऱ देखने में आती है कि जब कोई किसी के यहां से मिलकर वापस जाता है तो ये नहीं कहता कि मैं जाता हूँ.....वह कहता है कि मैं आता हूँ ( मी येतो / येते )

धन्यवाद इस रोचक पोस्ट के लिये।

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया पोस्‍ट !!

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

यादगार पोस्ट.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com