बुधवार, 5 नवंबर 2008

चाहतें



इस भागदौड भरी जिंदगी में पाना चाहती हु सुकून के कुछ पल
दिशाहीन उड़ानें भरते
मन के पंछी की रोकना चाहती हूं हलचल
किसी पेड़ के साए तले
तुम्हारे कंधे पर सर रखकर ढढना
चाहती हूं समस्याओं के हल
तुम्हारे साथ मिलकर
दिल के तारों को छेड़कर
गुनगुनाना चाहती हूं एक मीठी गजल
टिमटिमाते तारों को हाथ से छूकर
बनाना चाहती हूं उन्हें अपना आँचल
दूर किसी जंगल में विचरते हुए
प्रकृति माँ की गोद में बिताना चाहती हूं पल-पल।

9 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सुंदर भावों को संजोया है
सीधे शब्दों मैं

अच्छी रचना

adil farsi ने कहा…

दूर किसी जंगल में विचरते हुऐ....सुंदर कविता

ummed Singh Baid "saadahak " ने कहा…

काव्य की धारा सही, मगर ना ढूंढो बाहर.
राहत बस पाओगी स्वाति, अपने अन्दर.
अपने अन्दर झांकना तब मुश्किल होता है.
बाहर के व्यामोह में मन डूबा होता है.
शक है साधक, काम ना आये विचार-धारा.
मन के भाव बताये सही काव्य की धारा.

रंजना ने कहा…

sundar bhaavpoorn panktiyan hain.

mehek ने कहा…

bahut sundar bhav dil ko chu gaye

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन!!

makrand ने कहा…

दूर किसी जंगल में विचरते हुए
प्रकृति माँ की गोद में बिताना चाहती हूं पल-पल।
sunder kavita

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Wah..wa
kya baat hai..badhai..

dr.bhoopendra singh ने कहा…

acchi kavit,badhai .Prakriti ke nikat jana sabhi chahte hai. bhagwan kare aapki dua kubul ho.AAMEEN.
aapka hi
dr.bhoopendra